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संस्कृत वर्णमाला में कुल 14 स्वर वर्ण होते हैं जिनमें से ऋ एवं ऌ भी हैं। इन दोनों वर्णों का उच्चारण प्रायः अशुद्ध तरीके से किया जाता है।
देखने में आता है ऋ का उच्चारण री तथा ऌ का उच्चारण ल्री या ल्ह्री करते हैं।
यदि ऋ का उच्चारण री करें तो री को तोड़ने पर ―
री = र्+ई होगा।
जहाँ र् के उच्चारण हेतु जिह्वा नोक का स्पर्श मूर्द्धा से एवं ई के उच्चारण हेतु जिह्वा नोक का स्पर्श तालु से होता है।
स्वरों के उच्चारण में जिह्वा केवल किसी एक उच्चारण स्थान को स्पर्श करती है। जबकि री उच्चारण करने में जिह्वा का स्पर्श दो स्थानों मूर्द्धा और तालु से होता है। इस तरह से ऋ का उच्चारण करना गलत होगा।
इसी तरह ऌ का उच्चारण ल्री करने पर इसमें भी अशुद्धि की जाती है। यदि ल्री को तोड़ा जाये तो―
ल्री = ल्+र्+ई होगा।
जहाँ ल् के उच्चारण हेतु जिह्वा नोक का स्पर्श दाँतों से, र का उच्चारण हेतु जिह्वा नोक का स्पर्श मूर्द्धा से एवं ई के उच्चारण हेतु जिह्वा नोक का स्पर्श तालु से होता है।
इस तरह इस वर्ण के उच्चारण में भी जिह्वा नोक तीन मुखांगो को स्पर्श करती है। इसलिए स्वरों के उच्चारण की दृष्टि से इस तरह का उच्चारण करना सही नहीं है।
इन वर्णों का सही उच्चारण जाने के लिए निम्न वीडियो को देखें।
सही उच्चारण करने के लिए मखांगो अर्थात मुँह के अंदर उच्चारण अवयव (अंगों) का ज्ञान होना आवश्यक है―
मुँह के अन्दर के उच्चारण अंग― ओष्ठ (ओंठ) दाँत, वर्त्स्य, मूर्द्धा (मसूड़ा), कठोर तालु, कोमल तालु, जिह्वा (जीभ), जिह्वा नोक, जिह्वा मध्य, जिह्वा पश्च, जिह्वा मूल आदि।
ऋ का सही उच्चारण – ऋ का उच्चारण सीखने के लिए एक शब्द का सहारा लिया जा सकता है। वह शब्द है ― धर्म (यह केवल समझने के लिए है)। धर्म शब्द थोड़ा सा लम्बा बोला जाए तो ध और म के बीच र् र् र् र् का उच्चारण होता है। लगभग ऐसा ही उच्चारण ऋ के लिए होता है। आपने देखा होगा छोटे बच्चे या बालक कभी-कभी आनन्द में अपनी जिह्वा को हिलाकर इस ऋकार का उच्चारण करते हैं।
यहाँ इस तरह से समझ सकते हैं कि धर्म शब्द का उच्चारण करते समय ध और म के मध्य में आने वाली ध्वनि के समान ध्वनि ही ऋ का उच्चारण है।
इसी तरह से ऌ का उच्चारण भी यदि जिह्वा नोक दातों को स्पर्श करे और थोड़ा कंपन पैदा हो अर्थात ल्र्र जैसी ध्वनि निकले तब वहाँ पर ऌ का सही उच्चारण होता है।
स्वरों के उच्चारण के संबंध में यहाँ स्पष्ट किया जाना आवश्यक है कि जिन वर्णों का लम्बा उच्चारण हो सकता है, वे स्वर कहलाते हैं। आपने गायकों (गवैयों) को आलाप भरते देखा होगा। आलाप केवल स्वरों की सहायता से भरा जा सकता है। व्यञ्जनों की सहायता से आलाप नहीं क्योंकि व्यञ्जनों का लम्बा उच्चारण नहीं होता है।
संस्कृत के पाँच ह्रस्व स्वरों में तीन प्रारम्भ के स्वर अ इ उ अखण्डित स्वर हैं और पूर्ण हैं। किंतु ऋ एवं लृ ये खण्डित स्वर हैं।
आशा है, उपरोक्त जानकारी उपयोगी एवं महत्वपूर्ण होगी।
Thank you.
R. F. Tembhre
(Teacher)
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